साईकिल से उतरके डाकिये ने दरवाज़े कि कुण्डी बजायी ही थी कि एक छोटा बच्चा दरवाज़ा खोलते ही बोल पड़ा, "यह किसके लिए है ?". "आपके घर में कोई बड़ा है क्या ?", डाकिये के इस सवाल का जवाब न देने के बजाय बच्चे ने उल्टा सवाल किया, "क्या यह मेरा है ?"|
"हाँ भई छोटे बाबू आपका ही है पर क्या कोई है घर में बड़ा जिसे मैं दूँ तो वो आपको पढ़ के सुना दे ?"
"मुझे ही दे दो न, पिताजी कहते हैं कि मैं भी अब बड़ा हो गया हूँ | "
बच्चे कि इस हठ के आगे डाकिये ने घुटने टेक दिये और कहा कि ," ठीक है, पर यह अपने पिताजी को ज़रूर दे देना " | उस चिट्ठी पर आगे कलम से लिखा हुआ था कि यह काफ़ी महत्वपूर्ण है कि वह चिट्ठी उसपे दिए पते पर पहुँच जाये | डाकिये ने चिट्ठी बच्चे के हाथ में पकड़ाई और जैसे ही जाने को हुआ तो बच्चा बोल पड़ा," क्या मेरे दस्तख़त नहीं लोगे ?"| डाकिये ने मुस्करा के बच्चे के सिर पे प्यार से हाथ फेरा और चला गया | नन्हे हर्ष ने वह चिट्ठी अंदर जाके मेहमान कक्ष में रख दी और खेलने में व्यस्त हो गया | शाम हो चुकि थी, जैसे ही बच्चे कि माँ घर में आरती घुमाते हुए मेज़ के पास पहुंची , उनकी नज़र एक लिफाफे पे पड़ी जो की वही लिफाफा था | उतने में रमेश बाबू की आवाज़ सुनाई पड़ी ," अजी बिंदु , हर्ष कहाँ हो दोनों ?" | हर्ष दौड़ के गोद में चढ़ गया और तुरन्त रमेश बाबू की कमीज़ कि जेब में हाथ डाल दिया और टॉफी निकाल ली | रमेश बाबू हँस पड़े | बिंदु जी ने उन्हे चाय दी और फिर दिन भर कि मोहल्ले कि बातें बताने में मशगूल हो गयीं |

रात हुई और सब सो गए | अगले दिन फिर वही रोज़मर्रा कि व्यस्तता में दिन बीता और वैसे ही शाम हुई | सब सो गए थे | रात को हर्ष अचानक से जग गया | शायद कोई बुरा सपना देखा था | उसे सुला कर रमेश बाबू किचन को पानी पीने गए और टहलते हुए मेहमान कक्ष में जाके बैठ गए | उन्होंने अपनी पसंदीदा पत्रिका उठायी ही थी, तभी उनकी नज़र एक लिफाफे पे गयी | यह वही लिफाफा था | उन्होंने उस पर भेजने वाले का नाम पढ़ा तो ऐसा लगा जैसे कि चेहरे पर ख़ुशी और उलझन कि भावनाओं का संगम हुआ हो | यह चिठ्ठी उनके बचपन के दोस्त विनय ने भेजी थी | पैंतीस साल हो गए थे एक दुसरे की शकल देखे या बात किये | यादों का सागर जैसे उमड़ कर के न जाने कितनी ही लहरें उनके आँखों के किनारे पे ला रहा हो | आँखें भरने को हो गयीं | उन्होंने चिठ्ठी वापस
लिफाफे में रखी और कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गए | हाथ माथे पे रखा और दुसरे हाथ से चिठ्ठी पकडे हुए माथे पे हाथ रख कर सोचने लग गए | इतनी गहरी सोच में डूबे रहे की पता ही नहीं चला कब भोर हो गयी और
अलार्म बजने लगा | वे फिर भी वैसे ही मुद्रा में लेटे रहे | बिंदु जी ने अलार्म बंद किया और रमेश बाबू की तरफ देखा कि वे जगे हुए हैं परन्तु सोच में डूबे हुए..........
( शेष अगले भाग में )
"हाँ भई छोटे बाबू आपका ही है पर क्या कोई है घर में बड़ा जिसे मैं दूँ तो वो आपको पढ़ के सुना दे ?"
"मुझे ही दे दो न, पिताजी कहते हैं कि मैं भी अब बड़ा हो गया हूँ | "
बच्चे कि इस हठ के आगे डाकिये ने घुटने टेक दिये और कहा कि ," ठीक है, पर यह अपने पिताजी को ज़रूर दे देना " | उस चिट्ठी पर आगे कलम से लिखा हुआ था कि यह काफ़ी महत्वपूर्ण है कि वह चिट्ठी उसपे दिए पते पर पहुँच जाये | डाकिये ने चिट्ठी बच्चे के हाथ में पकड़ाई और जैसे ही जाने को हुआ तो बच्चा बोल पड़ा," क्या मेरे दस्तख़त नहीं लोगे ?"| डाकिये ने मुस्करा के बच्चे के सिर पे प्यार से हाथ फेरा और चला गया | नन्हे हर्ष ने वह चिट्ठी अंदर जाके मेहमान कक्ष में रख दी और खेलने में व्यस्त हो गया | शाम हो चुकि थी, जैसे ही बच्चे कि माँ घर में आरती घुमाते हुए मेज़ के पास पहुंची , उनकी नज़र एक लिफाफे पे पड़ी जो की वही लिफाफा था | उतने में रमेश बाबू की आवाज़ सुनाई पड़ी ," अजी बिंदु , हर्ष कहाँ हो दोनों ?" | हर्ष दौड़ के गोद में चढ़ गया और तुरन्त रमेश बाबू की कमीज़ कि जेब में हाथ डाल दिया और टॉफी निकाल ली | रमेश बाबू हँस पड़े | बिंदु जी ने उन्हे चाय दी और फिर दिन भर कि मोहल्ले कि बातें बताने में मशगूल हो गयीं |

रात हुई और सब सो गए | अगले दिन फिर वही रोज़मर्रा कि व्यस्तता में दिन बीता और वैसे ही शाम हुई | सब सो गए थे | रात को हर्ष अचानक से जग गया | शायद कोई बुरा सपना देखा था | उसे सुला कर रमेश बाबू किचन को पानी पीने गए और टहलते हुए मेहमान कक्ष में जाके बैठ गए | उन्होंने अपनी पसंदीदा पत्रिका उठायी ही थी, तभी उनकी नज़र एक लिफाफे पे गयी | यह वही लिफाफा था | उन्होंने उस पर भेजने वाले का नाम पढ़ा तो ऐसा लगा जैसे कि चेहरे पर ख़ुशी और उलझन कि भावनाओं का संगम हुआ हो | यह चिठ्ठी उनके बचपन के दोस्त विनय ने भेजी थी | पैंतीस साल हो गए थे एक दुसरे की शकल देखे या बात किये | यादों का सागर जैसे उमड़ कर के न जाने कितनी ही लहरें उनके आँखों के किनारे पे ला रहा हो | आँखें भरने को हो गयीं | उन्होंने चिठ्ठी वापस
अलार्म बजने लगा | वे फिर भी वैसे ही मुद्रा में लेटे रहे | बिंदु जी ने अलार्म बंद किया और रमेश बाबू की तरफ देखा कि वे जगे हुए हैं परन्तु सोच में डूबे हुए..........
( शेष अगले भाग में )

Nice one... Waiting for next part.
ReplyDeleteThanks! Will publish the next one in few days.... ;-)
DeleteWaiting
DeleteBahut Jald Faizal bhai :-)
DeleteBring next part soon.. Best wishes..
ReplyDeleteThanks Chaudhary!
DeleteStarting a story with a suspense... good thought... par Ramesh babu kya soch rahe the??
ReplyDeleteHow would I know? I'd have to write the next part for that I guess ;-)
DeleteAmazing
ReplyDeleteWaiting for the next page ...
ReplyDeleteSure! Already working on it.
DeleteGreat awesome umdhaa sir ji....
ReplyDeleteThank You !
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